माँ नर्मदा की परिक्रमा – यात्रा नहीं, आत्मजागरण का मार्ग
- Swapnil M Mane
- 8 hours ago
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भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में अनेक तीर्थ यात्राओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन माँ नर्मदा परिक्रमा का स्थान अद्वितीय है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मशोधन, समर्पण, सेवा और साधना का ऐसा मार्ग है जो साधक के जीवन को भीतर से बदल देता है।
दादागुरु भगवान कहते हैं कि माँ नर्मदा की परिक्रमा केवल पैरों से नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और समर्पण से पूरी होती है। जो व्यक्ति इस पथ पर चलता है, वह केवल नर्मदा तटों को नहीं देखता, बल्कि स्वयं को भी जानने लगता है।
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे दौड़ रहा है, लेकिन स्वयं से दूर होता जा रहा है। परिक्रमा इस दूरी को समाप्त करने का माध्यम बनती है। जब साधक नर्मदा तटों के साथ चलता है, प्रकृति के बीच रहता है, साधना करता है और सेवा का अनुभव करता है, तब उसके भीतर एक नई चेतना का उदय होता है।
माँ नर्मदा परिक्रमा हमें धैर्य सिखाती है। यह सिखाती है कि जीवन केवल मंजिल तक पहुँचने का नाम नहीं, बल्कि प्रत्येक कदम को जागरूकता के साथ जीने का नाम है। परिक्रमा के दौरान मिलने वाले अनुभव, लोग, परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ स्वयं में एक जीवंत गुरु बन जाती हैं।
दादागुरु भगवान के मार्गदर्शन में होने वाली परिक्रमा की एक विशेषता यह भी है कि इसमें सेवा और साधना साथ-साथ चलती हैं। परिक्रमावासियों के लिए भोजन, आवास, चिकित्सा और अन्य व्यवस्थाएँ केवल सुविधाएँ नहीं हैं, बल्कि सेवा के माध्यम से प्रेम और करुणा का अनुभव कराने का प्रयास हैं। यही कारण है कि अनेक साधक परिक्रमा को अपने जीवन का परिवर्तनकारी अनुभव मानते हैं।
परिक्रमा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्रकृति से जुड़ाव है। माँ नर्मदा के तटों पर चलते हुए व्यक्ति समझता है कि नदी केवल जल नहीं, बल्कि जीवन है। वृक्ष, पर्वत, वन, पशु-पक्षी और समस्त प्रकृति एक ही चेतना की अभिव्यक्ति हैं। यही अनुभव पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न करता है।
दादागुरु भगवान का संदेश है कि परिक्रमा का वास्तविक उद्देश्य केवल एक धार्मिक परंपरा का पालन करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, अशांति और भ्रम का परित्याग करना है। जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति और ईश्वर की विशाल व्यवस्था का एक छोटा सा हिस्सा मानने लगता है, तब उसके जीवन में विनम्रता और आनंद का जन्म होता है।
माँ नर्मदा परिक्रमा हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा मार्ग बाहर नहीं, भीतर की ओर जाता है। जो इस यात्रा को समझ लेता है, वह केवल परिक्रमा नहीं करता, बल्कि स्वयं के वास्तविक स्वरूप के निकट पहुँच जाता है।
समर्थ वाणी संदेश
“माँ नर्मदा की परिक्रमा पगों की यात्रा नहीं, चेतना की यात्रा है। जो इस पथ पर चलता है, वह स्वयं को खोजने निकलता है और माँ की कृपा में स्वयं को पा लेता है।”

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