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समर्थ वाणी
समर्थ वाणी श्री दादागुरु भगवान के दिव्य विचारों, संदेशों और आध्यात्मिक ज्ञान का माध्यम है।


माँ नर्मदा की परिक्रमा – यात्रा नहीं, आत्मजागरण का मार्ग
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में अनेक तीर्थ यात्राओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन माँ नर्मदा परिक्रमा का स्थान अद्वितीय है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मशोधन, समर्पण, सेवा और साधना का ऐसा मार्ग है जो साधक के जीवन को भीतर से बदल देता है। दादागुरु भगवान कहते हैं कि माँ नर्मदा की परिक्रमा केवल पैरों से नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और समर्पण से पूरी होती है। जो व्यक्ति इस पथ पर चलता है, वह केवल नर्मदा तटों को नहीं देखता, बल्कि स्वयं को भी जानने लगता है। आज की भागदौड़ भरी दु


सेवा ही साधना है – दादागुरु भगवान का जीवन दर्शन
आज के समय में अधिकांश लोग आध्यात्मिकता को मंदिर, पूजा, जप और ध्यान तक सीमित समझते हैं। लेकिन महायोगी दादागुरु भगवान का जीवन और उनका संदेश हमें आध्यात्मिकता का एक व्यापक और जीवंत स्वरूप दिखाता है। उनके अनुसार साधना केवल स्वयं के कल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का भाव है। इसी कारण वे कहते हैं— “सेवा ही साधना है।” जब कोई व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से किसी भूखे को भोजन देता है, किसी रोगी की सहायता करता है, किसी वृक्ष को बचाता है, किसी नदी की रक्षा करता
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